shri yantra

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शनिवार, 14 जनवरी 2012

श्री यन्त्र और महालक्ष्मी यन्त्र का महत्त्व

यंत्रो का साहित्य मंत्रो की भाति विपुल मात्रा में पुराने ग्रंथो से प्राप्त होता है | दीपावली को अगर जन साधारण श्रद्धा और विश्वास के साथ व्यवहारिक रूप से साधना करता है तो अवश्य चमत्कारिक प्रभाव का अनुभव करता है | यन्त्र अनेक कामनाओ की पूर्ति करने में सक्षम होते है | 
श्री यन्त्र -: 
तंत्र शास्त्र के अनुसार त्रिपुरा त्रिपुर सुंदरी के सभी नाम माँ लक्ष्मी के पर्यायवाची है | लक्ष्मी प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक उपायों में श्री यन्त्र साधना का विशेष महत्त्व है | किसी भी शुभ मुहूर्त में स्वर्ण पत्र , ताम्र पत्र , भोजपत्र , रजत पत्र अथवा किसी रत्न पर श्री यन्त्र की रचना करे और यन्त्र को धनतेरस के दिन सूर्यास्त के तीन घंटे पश्चात् किसी लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर , हल्दी या केसर से चावल पीले करके वस्त्र पर आच्छादित करके पूर्व दिशा अथवा पश्चिम दिशा की और स्थापित करे | प्राण प्रतिष्ठा और पंचोपचार पूजन करके यन्त्र पर लाल पुष्प , अक्षत , रोली , धुप दीप , नेवैध्य अर्पित करे | तत्पश्चात श्री यन्त्र की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर सुंदरी का ध्यान करे | इसके पश्चात् निम्न मंत्र का निश्चित समय , निश्चित संख्या में तीनो धन तेरस , नरक चौदस , दीपावली को जप करे | पूजा पूर्ण होने पर मंत्र की एक माला का जप प्रतिदिन करे | इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर बिज है | प्रत्येक बिज स्वयं में एक सम्पूर्ण मंत्र और देवता का स्वरूप है | अनुभव बताता है की घर में श्री यन्त्र की उपासना एवं स्थापना , दर्शन मात्र से लक्ष्मी जी का आगमन उनकी कृपा स्वयं ही द्रष्टिगोचर होने लगाती है | 
मंत्र - ह्रीं क ए ल ह्रीं 
ह स क ल ह्रीं 
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श्री महालक्ष्मी यन्त्र -: 
प्राचीन कल से धन सम्पदा और वैभव की देवी महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए महालक्ष्मी यन्त्र की उपासना की जाती है | शुभ मुहूर्त में महालक्ष्मी यन्त्र की रचना और स्थापना के पश्चात् पंचोपचार पूजा करनी चाहिए | यन्त्र की रचना स्वर्ण यन्त्र , ताम्र यन्त्र , रजत पत्र और भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार की कलम से करनी चाहिए | प्रतिष्ठा के पश्चात् लाल आसन पर यन्त्र को विराजमान करके लाल चन्दन , लाल पुष्प , धुप , दीप और नेवैध्य अर्पित करने चाहिए और पुरे समय ॐ श्री महा लक्ष्य्मे नाम : मंत्र जपते रहे | इसके पश्चात् अगर समय है , तो श्री सूक्त का पाठ करे या महालक्ष्मी जी की स्तुति करे | स्तुति के बाद धनतेरस की शाम से मंत्र की निश्चित संख्या में जप प्रारंभ करे व् धन तेरस , नरक चौदस व् दीपावली को जप पूर्ण कर हवन पत्र में उसी मंत्र के अंत में स्वाहा लगाकर हवन करना चाहिए हवन सामग्री में सहद घी सक्कर और बिल्व फल का उपयोग करे | जप मंत्र :- ॐ श्री महालाक्ष्मेय नमः | हवन के बाद कुंवारी कन्याओ को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए | साधनाकाल में पूरी आस्था, श्रद्धा , सयम रखना आवश्यक है |